बांके बिहारी मंदिर पर योगी सरकार को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “नहीं चलेगा अध्यादेश”
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — अध्यादेश पर लगाई अस्थायी रोक

उत्तर प्रदेश सरकार को बांके बिहारी मंदिर से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। अदालत ने योगी सरकार द्वारा लाए गए उस अध्यादेश (Ordinance) पर अस्थायी रोक लगा दी है, जिसके ज़रिए मंदिर की व्यवस्था और प्रबंधन को सरकार के अधीन लाने की योजना बनाई गई थी।
कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन में हस्तक्षेप से पहले सभी पक्षों की सहमति और पारदर्शिता ज़रूरी है। मंदिर से जुड़े सेवायतों और स्थानीय समुदाय की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार बिना व्यापक चर्चा और वैधानिक प्रक्रिया के धार्मिक स्थलों की व्यवस्था नहीं बदल सकती।
🛕 मंदिर प्रबंधन को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि
बांके बिहारी मंदिर, जो कि मथुरा स्थित सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिरों में से एक है, पिछले कुछ वर्षों से प्रबंधन, श्रद्धालु सुविधा, और भीड़ नियंत्रण को लेकर विवादों में रहा है।
राज्य सरकार ने दावा किया था कि मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या, अव्यवस्था और सुरक्षा कारणों से वहां का प्रशासनिक नियंत्रण एक सरकारी ट्रस्ट के माध्यम से चलाया जाना चाहिए।
हालांकि, मंदिर से जुड़े सेवायतों और धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उनका कहना है कि यह अध्यादेश धार्मिक स्वतंत्रता और परंपरागत अधिकारों के खिलाफ है।
🔍 सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा:
“सरकार अध्यादेश के ज़रिए धार्मिक स्थलों के centuries-old traditions को बिना बातचीत के नहीं बदल सकती। इससे समुदाय में अविश्वास और असंतोष फैलता है।”
कोर्ट ने यूपी सरकार से अध्यादेश को लेकर विस्तार से जवाब मांगा है और इस पर अगली सुनवाई तक उसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है।
🧭 योगी सरकार का पक्ष
उत्तर प्रदेश सरकार का तर्क है कि बांके बिहारी मंदिर एक राष्ट्रीय धरोहर है, और वहां श्रद्धालुओं की भीड़, सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार की बनती है।
सरकार ने यह भी कहा कि त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकने, बेहतर भीड़ नियंत्रण, डिजिटल दर्शन सुविधा, और स्वच्छता के लिए एक व्यवस्थित प्रशासन ज़रूरी है।
सरकार अध्यादेश के पक्ष में यह भी कह रही है कि यह कोई स्थायी कानून नहीं, बल्कि एक अंतरिम समाधान है जब तक सभी पक्षों के साथ मिलकर व्यापक कानून नहीं बनाया जाता।
🧘 धार्मिक समुदाय की प्रतिक्रिया
मंदिर से जुड़े पुजारी, सेवायत और भक्त समुदाय का मानना है कि सरकार का यह हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता और सदियों पुरानी परंपराओं का उल्लंघन है।
उनका कहना है कि मंदिर का प्रबंधन हमेशा से धार्मिक परिवारों और ट्रस्टों के हाथ में रहा है, और सरकार द्वारा बिना पूर्व चर्चा के कोई निर्णय लेना लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता दोनों के खिलाफ है।
संतुलन की ज़रूरत
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस दिशा में अहम है कि धार्मिक स्थलों की व्यवस्था में हस्तक्षेप संविधानिक दायरे में रहकर, सभी पक्षों की राय के बाद ही होना चाहिए।
यह मामला अब सिर्फ बांके बिहारी मंदिर का नहीं, बल्कि देशभर के धार्मिक स्थलों के प्रशासनिक ढांचे और धार्मिक अधिकारों के बीच संतुलन की बहस बन चुका है।
अब सभी की नजरें अगली सुनवाई और सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।

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