‘हम स्वागत को तैयार हैं’, पीएम मोदी की संभावित यात्रा पर दिया बड़ा बयान
🇨🇳 चीन ने दिया सकारात्मक संकेत, कहा – “हम स्वागत को तैयार हैं”
🇨🇳 चीन ने दिया सकारात्मक संकेत, कहा – “हम स्वागत को तैयार हैं”
चीन ने इस साल होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन को लेकर बड़ा बयान दिया है। बीजिंग ने कहा है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में शामिल होते हैं, तो वह उनका “दोस्ती भरे माहौल में स्वागत करने को तैयार है।”
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि SCO एक ऐसा मंच है जो सहयोग, समावेशिता और शांति को बढ़ावा देता है, और चीन चाहता है कि सदस्य देश आपसी मतभेदों को पीछे छोड़कर संवाद के रास्ते आगे बढ़ें।
प्रवक्ता ने कहा, ‘हम स्वागत को तैयार हैं’। हम भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, अगर वह भाग लेते हैं तो यह पूरे क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत होगा।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और चीन के बीच रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों से तनाव बना हुआ है, खासकर 2020 की गलवान झड़प के बाद। ऐसे में चीन का यह रुख कूटनीतिक दृष्टिकोण से बेहद अहम माना जा रहा है।
🇮🇳 पीएम मोदी की पिछली चीन यात्राएं: रणनीतिक संबंधों की गवाही
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले 2018 में दो बार चीन का दौरा कर चुके हैं, जो दोनों ही भारत-चीन संबंधों के लिहाज़ से अहम थे।
1. वुहान अनौपचारिक वार्ता (अप्रैल 2018):
यह भारत और चीन के बीच पहली बार एक अनौपचारिक शिखर वार्ता थी। वुहान में हुई यह मुलाकात दोनों देशों के नेताओं के बीच विश्वास बहाली की एक बड़ी पहल मानी गई थी। दोनों पक्षों ने सीमा शांति, व्यापारिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समन्वय बढ़ाने जैसे अहम विषयों पर चर्चा की थी।
2. किंगदाओ SCO समिट (जून 2018): ‘हम स्वागत को तैयार हैं’
इसके कुछ ही महीनों बाद, पीएम मोदी ने किंगदाओ में आयोजित SCO सम्मेलन में भाग लिया। इस सम्मेलन में उन्होंने आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और क्षेत्रीय व्यापार जैसे मुद्दों पर भारत का पक्ष रखा। सम्मेलन के दौरान भारत और चीन के बीच हुई बाइलेटरल मीटिंग्स ने दोनों देशों को कूटनीतिक रूप से जोड़ने का काम किया।
इन दोनों यात्राओं ने दिखाया कि भारत और चीन, मतभेदों के बावजूद, संवाद बनाए रखने की इच्छा रखते हैं।
🌏 SCO की भूमिका और भारत की रणनीतिक स्थिति
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की स्थापना 2001 में हुई थी और यह अब एशिया का एक प्रमुख बहुपक्षीय मंच बन चुका है। इसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और मध्य एशिया के देश शामिल हैं। इस संगठन का उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।
भारत 2017 में SCO का पूर्ण सदस्य बना और तब से वह इस मंच के ज़रिए अपनी Act East Policy और Neighbourhood First Policy को मजबूती देने का प्रयास कर रहा है।
SCO सम्मेलन भारत के लिए एक ऐसा अवसर बन गया है जहां वह अपने रणनीतिक हितों को संतुलित करते हुए चीन और रूस जैसे देशों के साथ संवाद बनाए रख सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ रही हैं।
🔍 भारत-चीन संबंधों का वर्तमान परिदृश्य : ‘हम स्वागत को तैयार हैं’
गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के बीच भरोसे की कमी साफ दिखाई दी है। हालांकि सैन्य स्तर पर बातचीत के कई दौर हो चुके हैं, लेकिन राजनीतिक संबंधों में ठंडापन बना हुआ है। ऐसे में अगर पीएम मोदी SCO सम्मेलन में भाग लेते हैं और शी जिनपिंग से मुलाकात होती है, तो यह भारत-चीन संबंधों में एक नई शुरुआत का संकेत हो सकता है।
भारत ने अभी तक औपचारिक तौर पर पीएम मोदी की भागीदारी की पुष्टि नहीं की है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा गर्म है कि इस बार की SCO बैठक सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि संभावनाओं का द्वार भी खोल सकती है।
‘हम स्वागत को तैयार हैं’
चीन की ओर से प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत को लेकर दिया गया बयान इस बात का संकेत है कि SCO जैसे मंच भारत और चीन के बीच संवाद को फिर से शुरू करने में सहायक हो सकते हैं।
अगर मोदी इस सम्मेलन में शामिल होते हैं, तो यह न केवल एक कूटनीतिक संतुलन का संकेत होगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को भी और मज़बूती देगा।


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