69000 सहायक अध्यापक भर्ती से जुड़े केस में हाईकोर्ट का फैसला, चार शिक्षकों को बहाल करने के आदेश
69000 सहायक अध्यापक भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सद्भावनापूर्ण त्रुटि के मामले में सहानुभूतिपूर्ण नज़रिया अपनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने चार शिक्षकों की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभ्यर्थी ने चयन प्रक्रिया में जानबूझकर अपने अंकों को बढ़ाकर लाभ लेने का प्रयास किया है तो उसे किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती जबकि सद्भावनापूर्ण भूल या अभ्यर्थी को किसी प्रकार का लाभ न पहुंचाने वाली त्रुटि के मामलों में सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा 2019 से संबंधित दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।
याचिकाओं में याचियों की सेवा समाप्ति के नौ मई और 2021 मई के आदेशों को चुनौती दी थी। सेवा समाप्ति का आधार यह था कि आवेदन पत्र में उन्होंने अपने वास्तविक शैक्षणिक अंकों की तुलना में अधिक अंक दर्शाए थे, जिसके आधार पर उनका चयन हुआ था। कोर्ट ने अपने निर्णय में शीर्ष न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए लाभदायक स्थिति व नुकसानदायक स्थिति के बीच स्पष्ट अंतर किया। कोर्ट ने कहा कि यदि अभ्यर्थी की त्रुटि से उसे कोई अनुचित लाभ प्राप्त नहीं होता है या वह त्रुटि परिस्थितिजन्य या सद्भावनापूर्ण भूल के कारण हुई हो तो ऐसे मामलों को धोखाधड़ी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
रिकॉर्ड के अवलोकन के बाद कोर्ट ने पाया कि याची प्रीति, मनीष कुमार माहौर, रिंकू सिंह और स्वीटी शौकीन के मामलों में अंकों को लेकर हुई विसंगति जानबूझकर लाभ लेने के उद्देश्य से नहीं थी। कोर्ट ने माना कि इन मामलों में या तो विश्वविद्यालय द्वारा संशोधित मार्कशीट जारी किए जाने के कारण अंकों में बदलाव हुआ या फिर ऐसी त्रुटि हुई जिससे याचियों को कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उनकी सेवा समाप्ति के आदेशों को रद्द कर उनकी सेवाएं बहाल करने का निर्देश दिया।
शेष याचियों के मामलों में कोर्ट ने पाया कि उन्होंने आवेदन पत्र में जानबूझकर अपने वास्तविक अंकों से अधिक अंक दर्शाए थे, जिससे उनकी योग्यता सूची में स्थिति प्रभावित हुई और उन्हें अनुचित लाभ मिला। न्यायालय ने इस आचरण को गंभीर बताते हुए कहा कि इसे केवल मानवीय भूल नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यह स्थापित सिद्धांत है कि धोखाधड़ी किसी भी गंभीर कृत्य को दूषित कर देती है और ऐसी स्थिति में न्यायालय किसी प्रकार की राहत नहीं दे सकता।

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