12 साल में पहली बार संसद के अंदर हारी मोदी सरकार, अब क्या है आगे का प्लान?
भारत के संसदीय इतिहास में 17 अप्रैल 2026 का दिन बेहद अहम बन गया है। 2014 में सत्ता में आने के बाद से पिछले 12 सालों में यह पहली बार है जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए (NDA) सरकार को लोकसभा के अंदर किसी बिल पर सीधी और बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को पास कराने में विफल रही, जिसके बाद उसे परिसीमन से जुड़े दो अन्य अहम बिल भी वापस लेने पड़े।
मोदी सरकार ने 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण कानून) पास कराया था, लेकिन इसे अगली जनगणना (2027) और परिसीमन के बाद लागू होना था। इस प्रक्रिया में हो रही देरी को देखते हुए सरकार 131वां संशोधन बिल लेकर आई थी। इस बिल के मुख्य उद्देश्य थे: लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करना। की जनगणना के आधार पर जल्द-से-जल्द नया परिसीमन लागू करना, ताकि 33% महिला आरक्षण को 2029 के आम चुनावों से पहले ही लागू किया जा सके।संविधान संशोधन बिल होने के कारण इसे पास कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई विशेष बहुमत की आवश्यकता थी।
131वां संशोधन बिल गिरने के तुरंत बाद, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इससे जुड़े दो अन्य बिल- परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 को भी वापस ले लिया है। सरकार का तर्क है कि ये तीनों बिल एक-दूसरे से जुड़े थे, इसलिए अकेले परिसीमन बिल का कोई औचित्य नहीं है।
इस बिल के गिरने का सीधा मतलब है कि अब 2029 के लोकसभा चुनावों में 33% महिला आरक्षण लागू होना लगभग असंभव हो गया है। अब यह आरक्षण अपने पुराने तय शेड्यूल यानी 2026-27 की नई जनगणना के पूरे होने और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू हो पाएगा। यह अधिनियम आधिकारिक तौर पर 16 अप्रैल, 2026 को लागू हुआ, लेकिन 33% आरक्षण कोटा के 2033-2034 तक पूरी तरह से लागू होने की उम्मीद है।
यह पहली बार है जब नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाया गया और वोटिंग के लिए रखा गया कोई बिल संसद में गिर गया हो। हालांकि सरकार को पहले कार्यकाल की शुरुआत में भूमि अधिग्रहण कानून और दूसरे कार्यकाल में कृषि कानूनों का विरोध झेलना पड़ा था और कदम पीछे खींचने पड़े थे, लेकिन वे बिल इस तरह वोटिंग में हारे नहीं थे।
2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून (POTA) राज्यसभा में गिर गया था हालांकि बाद में इसे संयुक्त सत्र बुलाकर पास करा लिया गया था। 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया 64वां संविधान संशोधन (पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए) भी राज्यसभा में गिर गया था। बाद में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में यह 73वें संशोधन के रूप में पास हुआ।

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