चारधाम, ज्योतिर्लिंग और अमरनाथ यात्रा के बाद भी खुश नहीं है मन? तो पढ़ें प्रेमानंद महाराज की ये बात
चार धाम, सारे ज्योतिर्लिंग और अमरनाथ की यात्रा के बाद भी आपको अंदर से अधूरापन लग रहा है? या आप ऐसा कभी पहले महसूस कर चुके हैं? तो आपको वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज की ये बात जरूर जाननी चाहिए। हाल ही में एक श्रद्धालु ने एकांतिक वार्तालाप के दौरान प्रेमानंद महाराज से यही सवाल पूछा है। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से ये बताने की कोशिश कि आखिर इन धार्मिक स्थलों पर यात्रा करने के बाद भी मन अधूरा सा क्यों लगता है? अपने जवाब में उन्होंने भगवान की कृपा के अनुभव से लेकर सत्संग की बात कही है। आइए जानते हैं कि उन्होंने क्या कहा है?
मैंने पूरी की है ना इसलिए अधूरा है। इसी वजह से अधूरा है क्योंकि ये सब कर्ता भाव से हो रहा है ना। कहीं एक शब्द नहीं आया कि महाराज जी भगवान की कृपा से गुरुदेव की कृपा से संत की कृपा से मुझे ऐसा ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि मैं चारों धाम, ज्योतिर्लिंग और अमरनाथ आदि पवित्र यात्राओं का सौभाग्य मुझे भगवान ने दिया वो गुरु कृपा से मिला हरि कृपा से मिला पर एक अधूरापन सा लग रहा है। तो उसका उत्तर दूसरा था। शब्द का ही उत्तर है। इसमें कर्ता है ना। कर्ता है तो पुण्य हुआ। पुण्य हुआ तो उसका सुख-लाभ सांसारिक होगा ना कि भागवतिक।
प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा कि अगर प्रभु की कृपा मिला ली जाए और दैन्य भाव से यात्रा की जाए और भगवान को समर्पित कर दी जाए तो ये बात नहीं आएगी कि कुछ अधूरा सा रह गया है। अभी नाम नहीं चल रहा है। भगवत समर्पण नहीं है। भगवत कृपा का प्रतिपल अनुभव नहीं है। यही अधूरापन है। अच्छा तभी महसूस होगा तब कृपा सा अनुभव होता है। जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदास हूं। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूं। जिस समय हम कृपा के लिए बलिहारी जाते हैं तो कृपा बरसती है और हमें विश्रामपद दे देती है। परम पद दे देती है। भगवत प्रेम दे देती है। तो अभी भगवान के प्रति समर्पण की कमी ही आपको अधूरापन का अनुभव करा रही है। संत समागम करो।
एक पल में जो तुम्हारी बुद्धि को परिवर्तिक करके भगवान में स्थित कर दें वो सत्संग है। सत्संग क्या है? जो तुम्हारी बुद्धि को ऐसा बदले कि उसे भगवान सच्चिदानंद की भक्ति में स्थिर कर दें उसे कहा जाता है। अगर परिवर्तन नहीं तो फिर सत्संग कैसा?
सत्संग वही जो परिवर्तन कर दें। शब्द जबरदस्ती घुस जाए तुम्हारे दिमाग में और तुम्हें भगवान का दास बना दे तो उसे सत्संग कहा जाता है। अगर ऐसे संतों का संग मिल जाए तो अधूरापन खत्म हो जाएगा। निरंतर भगवान के नाम का जप करना। भगवान के नाम का स्मरण करना। ये सबसे महत्वपूर्ण बात है और भगवान की कृपा का अनुभव करना। हर क्षण भगवान की कृपा का अनुभव करो।
डिस्क्लेमर- (इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)

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