मुसलमान देशों में एक और बड़ी फूट, कैसे सऊदी और पाकिस्तान बने ओपेक से UAE के अलग होने की वजह
तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक से संयुक्त अरब अमीरात ने अलग होने का फैसला लिया है। बीते 60 सालों से यूएई इस संगठन का हिस्सा था और अब यदि अलग हो रहा है तो यह बड़ी बात है। इस संगठन में ज्यादातर मुसलमान देश ही शामिल रहे हैं। ऐसे में संयुक्त अरब अमीरात का मुस्लिम बहुल संगठन से अलग होने का फैसला अहम है। जानकारों का कहना है कि संयुक्त अरब अमीरात के एग्जिट की वजह सऊदी अरब से मतभेद है। इसके अलावा पाकिस्तान भी इसकी एक वजह माना जा रहा है। सऊदी और यूएई के बीच सालों से मतभेद रहे हैं, लेकिन ईरान से जंग के चलते ये थोड़े दब गए थे। अब फिर से उभरते दिख रहे हैं।
फाइनेंशियल टाइम्स से बातचीत में यूरेशिया ग्रुप के मिडल ईस्ट डायरेक्टर फिरास मकसद ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात किसी तरह के दबाव में नहीं रहना चाहता। कई बार ऐसा होता है कि संयुक्त अरब अमीरात तेल का अधिक उत्पादन करना चाहता है और सऊदी अरब घटाना चाहता है। ऐसे में ओपेक का हिस्सा रहते हुए यूएई पर तेल उत्पादन घटाने का दबाव रहता है। अब उसने संगठन से ही बाहर होकर इस दबाव से मुक्ति पा ली है। इसके अलावा पाकिस्तान से भी वह खफा है, जिसकी डिफेंस डील सऊदी अरब से हुई है।
इसकी वजह यह है कि ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान समझौते का दावा करता रहा है। दो बार बैठक भी कराई, लेकिन उसने कभी भी यूएई पर हमले के लिए ईरान की निंदा नहीं की। इस रवैये से यूएई आहत है और पाकिस्तान पर मौकापरस्ती दिखाने का आरोप लगा रहा है। यूएई के एक प्रतिनिधि ने कहा कि मध्यस्थ यदि पाकिस्तान बनना चाहता है तो उसे तटस्थ होकर काम भी करना होगा। अब बात इसकी करें कि आखिर यूएई को ओपेक समूह से निकलने का क्या फायदा होगा तो सच्चाई यह है कि वह सऊदी कंट्रोल से मुक्त होगा।
ओपेक में संयुक्त अरब अमीरात तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। उसने इस संगठन को 1967 में जॉइन किया था। फिर भी सऊदी अरब के द्वारा ही ओपेक देशों का प्रोडक्शन कोटा तय होता रहा है। अकसर यूएई को उसकी इच्छा से कम कोटा मिलता रहा है। अब वह इस संगठन से ही दूर हो गया है तो अपनी इच्छा के अनुसार तेल का उत्पादन कर सकेगा। इसके अलावा दुनिया में सप्लाई प्रभावित होने की स्थिति में ज्यादा सप्लाई करके वह फायदा उठा सकेगा। अब ओपेक के नियमों के चलते कंट्रोल करने की कोई जरूरत नहीं होगी।

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