बीजेपी जीती तो कौन बनेगा पश्चिम बंगाल का अगला मुख्यमंत्री? अमित शाह ने बताई दो खासियतें
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार जोरों पर है। खैरासोल में एक रैली को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि बीजेपी जीतती है तो ऐसा मुख्यमंत्री होगा जो कि बंगाली बोलता हो और जो बंगाल में ही पला-बढ़ा हो। बता दें कि बीजेपी इस बार विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत का दावा कर रही है। शाह ने कहा कि बंगाल में भाजपा की जीत के बाद संदेशखालि, आर जी कर, साउथ कलकत्ता लॉ कॉलेज, दुर्गापुर लॉ कॉलेज जैसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी।
शाह ने कहा, तृणमूल सरकार ने घोटालों के जरिए 5,000 करोड़ रुपये की हेराफेरी की। भाजपा के सत्ता में आने के बाद घोटालेबाजों को जनता को एक-एक पैसा लौटाना होगा। ममता सरकार ने सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन आवंटित नहीं की, भाजपा बंगाल में सत्ता संभालने के 45 दिनों के भीतर इसके लिए जमीन आवंटित करेगी।
बीरभूम जिले के मयूरेश्वर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए शाह ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य के बहुसंख्यक समुदाय को डराने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा कि यह चुनाव राज्य और देश से घुसपैठियों को बाहर निकालने का है। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने राज्य में पर्याप्त केंद्रीय बल भेजे हैं। शाह ने कहा, ‘तृणमूल कांग्रेस के गुंडे चुनाव के दिन घर पर ही रहें, अन्यथा चार मई के बाद उन्हें जेल भेज दिया जाएगा।’
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी एक रैली में बीजेपी पर करारा हमला किया है। उन्होंने कहा, केंद्र और 19 राज्य उनके खिलाफ एकजुट हैं और वह अकेले ही आम लोगों के लिए लड़ रही हैं। बीरभूम जिले के सूरी में एक रैली को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ने कहा कि भाजपा दिल्ली की ताकतों का उपयोग करके पश्चिम बंगाल चुनाव नहीं जीत पाएगी। उन्होंने कहा, ”पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस 226 से अधिक सीटें हासिल करेगी।” बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का प्रसारण युवाओं को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है।
उधर एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी बंगाल में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आखिर बंगाल में मुसलमानों की हालत इतनी खराब क्यों है। पिछले 50-60 सालों में बंगाल में सेक्युलर सरकारें रही हैं लेकिन अल्पसंख्यकों का जीवन स्तर नहीं सुधार पाई हैं। इसलिए अल्पसंख्यकों को स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत है।

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